
चंदौली जिले के जंगलों में गर्मी के दिनों में लौह शिलाजीत जैसी कीमती जड़ी बूटी मिलती है। विंध्य की पहाड़ियों पर तेज धूप में मिलने वाला लौह शिलाजीत सलोना और कड़वा होता है। इसकी गंध भी गोमूत्र जैसी होती है। खतरनाक रास्ता होने के कारण औरवाटांड़ की पहाड़ियों पर लौह शिलाजीत की तलाश में जाने से वन विभाग के अधिकारी आज भी कतराते हैं।

आपको बता दें कि चकिया-नौगढ़ मार्ग पर औरवाटांड़ के पास कर्मनाशा नदी के किनारे बारोबीर पहाड़ी पर लौह शिलाजीत का खजाना है। यहां की पहाड़ियों पर गर्मी के दिनों में तेज धूप के चलते पत्थरों से रस के रूप में लौह शिलाजीत निकलता है। 20 साल पहले चंदौली में लौह शिलाजीत मिलने की खोज वन विभाग के अधिकारी ने की थी। उस समय इसे लेकर एक बुकलेट का प्रकाशन भी हुआ था। अधिकारियों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। स्थिति यह है कि लाखों रुपये किलो बिकने वाला शिलाजीत जंगल में बर्बाद हो रहा है।
शिलाजीत के फायदे
इसके बारे में बीएचयू प्रो अनिल कुमार सिंह, द्रव्य-गुण, आयुर्वेद विभाग ने बताया कि शक्ति वर्धक दवाइयों और असाध्य रोगों के इलाज में लौह शिलाजीत का इस्तेमाल होता है। दिमाग तेज करने उच्च रक्तचाप के लिए घरेलू उपचार गठिया, एनीमिया, तनाव को दूर करना, मधुमेह, पाचन शक्ति, स्मरण शक्ति और शारीरिक शक्ति बढ़ने में सहायक होता है।लौह शिलाजीत का आयुर्वेद में काफी महत्व है। चंदौली जनपद के नौगढ़ क्षेत्र की पहाड़ियों में यह पाया जाता है तो इसकी विशेषज्ञों से जांच कराई जाएगी।
चार रंग में होता है शिलाजीत
एसडीओ वन विभाग भदोही, (तत्कालीन रेंजर काशी वन्य जीव प्रभाग) केके पांडेय ने बताया कि औरवाटाड़ के पास पहाड़ी पर लौह शिलाजीत का रसास्वादन करते हुए बंदरों को देखा गया था। लेकिन खतरनाक रास्ता होने के कारण वहां तक जाने की हिम्मत कोई नहीं जुटा पाता है। लौह शिलाजीत चार रंग स्वर्ण, रजत, ताम्र और लौह में होता है। 10 ग्राम शिलाजीत की कीमत 300 से लेकर 600 रुपये तक है।
औरवाटांड़ पहाड़ों पर शिलाजीत हुई खोज
काशी वन्य जीव प्रभाग के तत्कालीन वनाधिकारी एवं वर्तमान में केंद्र में पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के आईजी रमेश चंद्र पांडेय ने बताया कि 2001-02 में चंदौली में डीएफओ के पद पर कार्यरत थे। उस दौरान जंगल में आदिवासी लोग जड़ी बूटियों जैसे सतावर, गुडमार्ग, लटजीरा, कालमेघ आदि को जंगल से लाकर बेचते थे। उस दौरान दुर्लभ लौह शिलाजीत की जानकारी हुई। औरवाटांड़ के पास खतरनाक पहाड़ी पर रस के रूप में लौह शिलाजीत मिला था। बाद में इसका लैब टेस्ट भी कराया गया, जिसमें लौह शिलाजीत की पुष्टि हुई थी।



















