चंदौली जिले के कुछ ऐसे मुस्लिम बाहुल्य गांव है जहां के लोग हर साल बाराबंकी के देवा शरीफ मजार पर गुलाल और गुलाब के फूलों से होली खेलने जाते हैं। लेकिन रमजान उल मुबारक का माह चलने की वजह से इस बार नहीं जा रहे हैं।
आपको बता दें कि देवा शरीफ एक ऐतिहासिक हिन्दू-मुस्लिम धार्मिक स्थल है। यहां कौमी एकता की पहचान हाजी वारिस अली शाह की दरगाह है। यहां साल भर लोग दर्शन के लिए आते हैं। अक्टूबर-नवंबर में देवा शरीफ में मेले का आयोजन भी होता है। लेकिन होली के दौरान इस स्थान की रौनक देखने वाली होती है। दूर-दूर से लोग यहां होली समारोह में शामिल होने आते हैं। देवा शरीफ हाजी वारिस अली शाह की जन्मस्थली है, जिन्होंने मानवता के लिए प्रेम के अपने संदेश से कई पीढ़ियों के जीवन को प्रभावित किया है। हाजी वारिस अली शाह का जन्म 19वीं शताब्दी में हुसैनी सय्यदों के एक परिवार में हुआ था। सूफी संत हाजी वारिस अली शाह के चाहने वाले सभी धर्म के लोग थे। इसलिए हाजी साहब हर वर्ग के त्योहारों में बराबर भागीदारी करते थे। वह अपने हिंदू शिष्यों के साथ होली खेल कर सूफी परंपरा का इजहार करते थे। उनके निधन के बाद यह परंपरा आज भी जारी है। यहां की होली उत्सव की कमान पिछले कई दशक से संभाल रहे हैं। वही चन्दौली जिले के मुस्लिम समुदाय के लोगों की बात करें तो यहां कुछ ऐसे मुस्लिम बाहुल्य गांव हैं, जहां से हर साल गुलाल और गुलाब के फूलों से होली खेलने के लिए बाराबंकी देवा शरीफ जाते हैं। लेकिन रमजान का मुबारक महीना चने की वजह से इस बार मुस्लिम लोग नहीं जा सके।
चन्दौली के मुस्लिम समुदाय का कहना है कि यह देश की पहली दरगाह है, जहां होली के दिन रंग गुलाल के साथ जश्न मनाया जाता है। कौमी एकता गेट पर पुष्प के साथ चादर का जुलूस निकाला जाता है। इसमें आपसी कटुता को भूलकर दोनों समुदाय के लोग भागीदारी करके संत के ‘जो रब है, वही राम है’ के संदेश को पुख्ता करते हैं।



















