चन्दौली जिले में रहमत और बरकतों का महीना रमजान शुरू होने वाला है। इस माह का मुस्लिम बंधु बेसब्री से पूरे साल इंतजार करते हैं। इस पाक और मुकद्दस महीने में मुस्लिम बंधु रोजा रखते हैं नमाजे पढ़ने हैं और गरीबों व जरूरतमंदों के बीच जकात दान करते हैं और पूरे माह के रोजे के बाद ईद की नमाज अदा कर एक-दूसरे से सुखियां साझा करते हैं। जामा मस्जिद के इमाम व मौलाना मंसूर आलम ने बताया कि माह ए रमजान को कुल तीन हिस्सों में बांटा गया है। रमजान के पहले अशरे में मुसलमानों को ज्यादा से ज्यादा दान करके गरीबों की मदद करनी चाहिए। हर एक इंसान से प्यार और नरमी का व्यवहार करना चाहिए। यूं तो रमजान का पूरा महीना मोमिनों – के लिए खुदा की तरफ से अजमत, रहमत और बरकतों से लबरेज है। लेकिन अल्लाह ने इस मुबारक महीने को तीन अशरों में तक्सीम किया है।
*इस मुबारक महीने को तीन अशरों में किया गया तक्सीम*
पहला अशरा खुदा की रहमत वाला है। पहले अशरे में 10 दिनों तक अल्लाह की रहमत से सभी सराबोर होते रहेंगे। एक से 10 रमजान यानी पहले अशरे में खुदा की रहमत नाजिल होती है। रमजान का पहला अशरा बेशुमार रहमत वाला है। नेक काम के सवाब में 70 गुना इजाफा कर दिया जाता है।
रमजान का महीना रहमत व बरकत वाला है। हर मर्द, बच्चे, औरत और बूढे. रोजे का साथ नमाज-तरावीह में मशगूल रहते हैं। रमजान के 11वें रोजे से 20वें रोजे तक दूसरा अशरा चलता है। यह अशरा माफी का होता है। इस अशरे में लोग इबादत कर के अपने गुनाहों से माफी पा सकते हैं। इस्लामिक मान्यता के मुताबिक अगर कोई इंसान रमजान के दूसरे अशरे में अपने गुनाहों से माफी मांगता है तो दूसरे दिनों के मुकाबले इस समय अल्लाह अपने बंदों को जल्दी माफ करता है। रमजान का तीसरा और आखिरी अशरा 21वें रोजे से शुरू होकर चांद के हिसाब से 29वें या 30वें रोजे तक चलता है। ये अशरा सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
तीसरे अशरे का उद्देश्य जहन्नम की आग से खुद को सुरक्षित रखना है। इस दौरान हर मुसलमान को जहन्नम से बचने के लिए अल्लाह से दुआ करनी चाहिए। रमजान के आखिरी अशरे में कई मुस्लिम एतकाफ में बैठते हैं। एतकाफ में मुस्लिम मस्जिद में 10 दिनों तक एक जगह बैठकर अल्लाह की इबादत करते हैं।
मौलाना मंसूर आलम ने बताया कि बुधवार को शाम चांद नजर आते ही माहे मुबारक रमजान की शुरुआत हो गई। बृहस्पतिवार को मुस्लिम समाज द्वारा पहला रोजा रखा जाएगा। इसी के साथ एक माह तक मसजिदों और घरों में विशेष इबादतें की जाएगी। रात के आखिरी पहर सुबह सादिक से पहले सहेरी (हल्का खाना खाकर) कर रोजे की नीयत करके रोजा रखा जाता है। उन्होंने कहा कि रोजा सिर्फ भूखे प्यासे रहने का नाम नहीं है। रोजा आंख, हाथ, पैर, दिल, मुंह सभी का होता है। ताकि रोजा रखने वाला इंसान हमेशा बुराई से तौबा करता रहे और बुराइयों से बचता रहे।






