PRAHAR DUSTAK/चन्दौली। जिले के नियामताबाद क्षेत्र अंतर्गत चंदाइत गांव में बंदरों के बढ़ते आतंक ने ग्रामीणों का जीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि लोग घर से बाहर निकलने में भी भय महसूस कर रहे हैं। बंदरों के झुंड लगातार लोगों पर हमला कर रहे हैं, जिससे अब तक दर्जनों ग्रामीण घायल हो चुके हैं। गुरुवार शाम को परेशान ग्रामीणों ने हाथों में तख्तियां लेकर गांव में जोरदार विरोध प्रदर्शन किया और प्रशासन से तत्काल कार्रवाई की मांग की।
ग्रामीणों के अनुसार, गांव में बंदरों का बड़ा झुंड पिछले कई महीनों से आतंक मचा रहा है। ये बंदर खेतों में फसलों को नुकसान पहुंचाने के अलावा घरों में घुसकर सामान बिखेरते हैं और लोगों पर सीधे हमला करते हैं। हमलों में अब तक गंभीर चोटें आई हैं। ग्रामीण शहजाद और मंगरी के दोनों पैर टूट गए हैं, जबकि दो अन्य व्यक्तियों के हाथों में फ्रैक्चर हो गया है। इसके अलावा करीब दस बच्चों को बंदरों ने काट लिया, जिसके बाद उन्हें एंटी-रेबीज वैक्सीन लगवानी पड़ी और लंबा इलाज कराना पड़ा। कई लोग घायल होने के बावजूद रोजमर्रा के कामकाज प्रभावित होने से परेशान हैं। बच्चे स्कूल जाने से डरते हैं और महिलाएं घरेलू कामों में बाधा महसूस कर रही हैं।

ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने कई बार स्थानीय प्रशासन, वन विभाग और पुलिस को शिकायत की, लेकिन अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। बंदरों को पकड़कर उन्हें जंगल या सुरक्षित स्थान पर छोड़ने की मांग लंबे समय से की जा रही है, पर कार्रवाई न होने से लोगों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। विरोध प्रदर्शन के दौरान ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि यदि जल्द ही समस्या का समाधान नहीं किया गया तो आंदोलन और तेज किया जाएगा। वे सड़क जाम या भूख हड़ताल जैसे कदम उठाने को मजबूर हो सकते हैं।
प्रदर्शन में बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए। इनमें शंकर भारती, मनीष जायसवाल, अमरनाथ जायसवाल, अमरनाथ सोनकर, गोपाल, अमन सोनकर, धर्मदेव पांडेय, गीता बिंद, रामा देवी सोनकर, दुर्गा देवी सोनकर, खुशबू, निशा आदि प्रमुख थे। महिलाओं और बच्चों की भागीदारी खासतौर पर उल्लेखनीय रही। प्रदर्शनकारियों ने प्रशासनिक अधिकारियों से मिलने की मांग की और कहा कि बंदरों की समस्या केवल स्थानीय नहीं, बल्कि कई ग्रामीण इलाकों में आम हो गई है।

उत्तर प्रदेश में बंदरों का आतंक कई जिलों में बढ़ रहा है। वन विभाग के अनुसार, बंदरों की संख्या में वृद्धि और जंगलों में उनके प्राकृतिक आवास कम होने से वे गांवों की ओर रुख कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बंदरों को पकड़कर दूरस्थ जंगलों में छोड़ना या स्टेरलाइजेशन जैसे उपाय अपनाए जा सकते हैं, लेकिन इसमें समन्वय की कमी दिख रही है। चंदाइत गांव के मामले में ग्रामीणों की मांग है कि वन विभाग तुरंत टीम भेजे और बंदरों को पकड़ने का अभियान चलाए।
स्थानीय लोग अब उम्मीद कर रहे हैं कि प्रशासन उनकी आवाज सुनेगा और इस समस्या का स्थायी समाधान निकालेगा। अन्यथा, स्थिति और बिगड़ सकती है। यह घटना ग्रामीण भारत में वन्यजीव-मानव संघर्ष की बढ़ती समस्या को उजागर करती है, जहां विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण हो रहा है।






